Bhagavad Gita: अध्याय 4, श्लोक 11

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 11||

ये-जो; यथा-जैसे भी; माम्-मेरी; प्रपद्यन्ते–शरण ग्रहण करते हैं; तान्-उनको; तथा उसी प्रकार; एव-निश्चय ही; भजामि-फल प्रदान करता हूँ; अहम्-मैं; मम–मेरे; वर्त्म-मार्ग का; अनुवर्तन्ते–अनुसरण करते हैं; मनुष्याः-मनुष्य; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; सर्वशः-सभी प्रकार से।

अनुवाद

BG 4.11: जिस भाव से लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं उसी भाव के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ। हे पृथा पुत्र! सभी लोग जाने या अनजाने में मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।

भाष्य

यहाँ श्रीकृष्ण यह व्यक्त करते हैं कि भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के स्तर के अनुसार व्यवहार करते हैं। जो लोग भगवान के अस्तित्त्व को स्वीकार नहीं करते उनके प्रति वे कर्म के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं।वे उनके हृदय में बैठते हैं, उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और तदनुसार फल देते हैं किन्तु ऐसे नास्तिक लोग भी भगवान की दासता से बच नहीं सकते। भगवान की शक्ति माया उन्हें धन-संपत्ति, विलासिता, सगे संबंधी, प्रतिष्ठा आदि के मोह जाल में फंसा कर भगवान की दासता करने के लिए बाध्य करती है। माया उन्हें क्रोध, काम-वासना और लोभ के नियंत्रण में ले आती है। दूसरी ओर जो लोग अपने मन से सांसारिक आकर्षणों को हटाकर भगवान को अपना लक्ष्य और आश्रय मानकर उनके सम्मुख होते हैं, उनके लिए भगवान अपने बालक का पालन पोषण करने वाली एक माँ के समान उनकी देखभाल करते हैं। 

श्रीकृष्ण ने 'भजामि' शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ 'सेवा करना' है। वे शरणागत जीवात्माओं के अनन्त पापों का नाश कर देते हैं, माया के बंधनों से मुक्त कर देते हैं, उन्हें भौतिक संसार के अंधकार को मिटा देते हैं और दिव्य कृपा, दिव्य ज्ञान एवं दिव्य प्रेम प्रदान करते हैं। जब भक्त निष्काम भाव से उन्हें प्रेम करते हैं तब वे अपनी स्वेच्छा से उनके प्रेम के कारण दास बन जाते हैं। श्रीराम ने हनुमान से इस प्रकार से कहा-

एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यास्मि ते कपे।

शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयं ।। 

(वाल्मिकी रामायण) 

"हे हनुमान! तुमने मेरी जो सेवा की है उसके ऋण से उऋण होने के लिए मैं तुम्हें अपना जीवन समर्पित कर दूंगा। तथा तुम्हारी भक्ति के लिए मैं सदैव तुम्हारा ऋणी रहूँगा।" इस प्रकार भगवान सभी के साथ उनके समर्पण के आधार पर व्यवहार करते हैं। यदि भगवान अपने भक्तों पर दया करते हैं तब फिर कुछ लोग स्वर्ग के देवताओं की पूजा क्यों करते हैं? श्रीकृष्ण इसकी व्याख्या अगले श्लोक में करते हैं।

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